जैसे पूरा चाँद हो, मगर रौशनी नहीं।

कुछ तो रह गया है, अधूरा सा कहीं,

हर खुशी में कुछ कमी सी लगती है,

भीड़ में भी अब तन्हा सी लगती है।

लोग मिलते हैं, बातें होती हैं,

पर वो अपनापन अब दिखता नहीं।

कभी वक्त से शिकायत नहीं थी मुझे,

अब हर लम्हा सवाल बन कर चुभे।

तू जो गया, तो कुछ टूट गया अंदर,

अब दिल तो धड़कता है, पर पहले जैसी बात नहीं।

तेरी यादें किताबों की तरह रखी हैं,

हर पन्ने पे नाम तेरा लिखा है कहीं।

कोशिश की तुझे भूल जाने की बहुत,

पर तू अब भी हर साँस में बसा है यहीं।

कुछ तो रह गया है, अधूरा सा कहीं,

जैसे कोई गीत हो, मगर सुर नहीं।